
खंडवा की अनुष्का राठौर की पहल, ,,आओ तुम्हे चाँद पर ले जायें,,
चाँद पर इंसानी बस्ती के एक बड़े सपने को साकार करने वाली टीम में खण्डवा की बेटी भी
खंडवा। चाँद पर इंसानो की बस्ती बसाना अब महज़ कपोल -कल्पना नहीं बल्कि इस योजना पर पूरी संजीदगी और शिद्दत से युवा वैज्ञानिकों की टीम जुटी हुई है। यह टीम चाँद तक पहुंचने वाले स्पेस मिशन या रॉकेट साईंस पर रिसर्च नहीं कर रही बल्कि उससे आगे की प्रक्रिया पर रिसर्च कर रही है कि चाँद पर जब इंसान बसने की सोचेगा तो उसके जीवन में किस तरह की व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक दिक्कतें आयेंगी। इस टीम की युवा रिसर्चर अनुष्का राठौर कहती है कि “चंद्रमा तक पहुंचना एक इंजीनियरिंग चुनौती है; वहां रहना एक मानवीय चुनौती।” समाजसेवी सुनील जैन ने बताया की खंडवा जिले में हर विधा में प्रतिभाओं की कमी नहीं है यदि इन प्रतिभाओं को अच्छा मंच मिल जाता है तो यह प्रतिभाएं खंडवा का नाम देश-विदेश में रोशन करती हैं। खंडवा की ही अनुष्का राठौर भले ही चांद पर ना पहुंची हो लेकिन वह चांद की एक आवासीय दुनिया में रहकर इस पर रिसर्च कर रही है। अब जरा अनुष्का राठौर के बारे में पहले जान लीजिये कि खण्डवा की यह बेटी कौन है ? फिर उसके काम के बारे में समझिये। अनुष्का खण्डवा के प्रसिद्द नेत्र रोग विशेषज्ञ स्व. डॉ यू जी राठौर ,श्रीमती शकुंतला राठौर की पोत्री है और अनुराग – पिंकी राठौर की सुपुत्री। वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेलबोर्न से बायोटेक्नोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएट है और स्पेस वुमन एम्पावरमेंट काउन्सिल की बोर्ड मेम्बर। वे एस्ट्रोनॉट नहीं है और हाल ही में उनके स्पेस या चाँद पर जाने की कोई तत्काल सम्भावना भी नहीं है लेकिन वे एक चाँद की एक आभासी दुनिया में रहकर इस पर रिसर्च कर रही है कि चाँद पर जाने और वहाँ बसने वाले लोगो के जीवन में किस तरह की जटिलताएं होंगी और उसके क्या समाधान होंगे ? समाज सेवी सुनील जैन ने बताया की चाँद की इसी आभासी दुनिया में रिसर्च के लिए बना है एनालॉग स्पेस मिशन और यह कहीं विदेश में नहीं हमारे अपने ही देश भारत में गुजरात के कच्छ में शुरू हुआ है। कच्छ के रण का निर्जन , सफेद विस्तार पृथ्वी पर चंद्रमा की सतह से काफ़ी मिलता जुलता है , हाँ जीरो ग्रेविटी जरूर यहाँ नहीं है। फिर भी यहाँ धोलावीरा को चाँद पर अनुसंधान के लिए उपयुक्त पाया गया। पिछले एक सप्ताह से, यह दुर्गम भूभाग भारतीय अंतरिक्ष अन्वेषण में एक ऐतिहासिक छलांग के लिए परीक्षण स्थल के रूप में कार्य कर रहा है और यह है देश का पहला नागरिक एनालॉग अंतरिक्ष मिशन।
अनुष्का राठौर की इस टीम में भूमिका एक हेल्थ ऑफिसर के रूप में ह्यूमन फेक्टर्स और बिहेवियरल पर अपने को फोकस करना था। अनुष्का मानती है कि स्पेस मिशन में इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी के जितनी ही महत्वपूर्ण भूमिका क्रू मेंबर की मनःस्थिति , जिसे अलग करके नहीं देखा जा सकता। यहाँ अंतरिक्ष के एकाकीपन और सीमित जगह में रहने से मानव स्वभाव पर विपरीत असर पड़ता है जिससे निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है। मानव तत्व मिशन के मनोवैज्ञानिक संरक्षक के रूप में, राठौर को अंतरिक्ष उड़ान की सबसे जटिल चुनौतियों में से एक का कार्य सौंपा गया था: एकाकीपन के तनाव के तहत चालक दल के सामंजस्य और संज्ञानात्मक प्रदर्शन को बनाए रखना। थकान, तनाव के स्तर और व्यवहारिक गतिशीलता की निगरानी करके, राठौर ने चालक दल की अधिकतम दक्षता सुनिश्चित की और जीवन रक्षा और परिचालन उत्कृष्टता के बीच संतुलन स्थापित किया। यह मिशन महज एक सिमुलेशन से कहीं अधिक था; यह इरादे की घोषणा थी। भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र फल-फूल रहा है, और यह मिशन साबित करता है कि अंतरिक्ष क्षेत्र के अग्रदूतों की अगली पीढ़ी तैयार है। इस मिशन से जब दल “वास्तविक दुनिया” में लौटता है, तो वे न केवल डेटा वापस लाते हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित करते है कि जब भारत अंततः चंद्रमा पर एक बेस बनाएगा, तो हमें ठीक-ठीक पता होगा कि वहां फलने-फूलने के लिए क्या आवश्यक है।








